Friday, June 25, 2010

मौलिक आत्मीय स्वरूप

समाधिस्थ अवस्था में उपलब्ध चेतन्यशील एवं पर्काशमान स्वरूप ही हमारा मोलिक आत्मीय स्वरुप है, जो की इस भोतिक सरीर से भिन्न, निर्मल, निर्लिप्त, निर्विकार एवं पावन है. इस दिव्य स्वरूप का दर्शन ही निस्संदेह आत्म साक्षात्कार कहलाता है. समाधिस्थ साधक एवं सरेष्ठ योगीजन स्वाश गति को साधकर अपने इसी स्वरूप में अवस्थित हो आनंदित रहते हैं.

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