Friday, June 25, 2010
मौलिक आत्मीय स्वरूप
समाधिस्थ अवस्था में उपलब्ध चेतन्यशील एवं पर्काशमान स्वरूप ही हमारा मोलिक आत्मीय स्वरुप है, जो की इस भोतिक सरीर से भिन्न, निर्मल, निर्लिप्त, निर्विकार एवं पावन है. इस दिव्य स्वरूप का दर्शन ही निस्संदेह आत्म साक्षात्कार कहलाता है. समाधिस्थ साधक एवं सरेष्ठ योगीजन स्वाश गति को साधकर अपने इसी स्वरूप में अवस्थित हो आनंदित रहते हैं.
निष्फल चेष्टा
मूर्ख और धूर्त का बोधिक मार्गदर्शन करना, छलनी में जल भरने की निष्फल चेष्टा करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है.
आत्मा: एक सास्वत विजेता
आत्मा न केवल इस सृष्टि का सास्वत सत्य है, अपितु सास्वत विजेता भी है, जो कभी किसी से परास्त नहीं हुआ, भले ही वह मृत्यु क्यों न हो.
नयायधर्मी परकृति
यह तथ्य स्वं में एक सास्वत यतार्थ है की जो व्यक्ति छलपूर्वक अथवा बलपूर्वक सत्य एवं न्याय का हरण करने में सफल हो जाते हैं, ईश्वरीय परकृति स्वभावतय उनके परति परतिकुल क्रम में परिवर्तित होने लगती है.
आध्यात्म, विज्ञान और सत्य
परस्पर दिशा-भिन्नता और अनेक पर्तिकुल्ताओं के बावजूद आत्म-शक्ति आधारित आधातम और यांत्रिक शक्ति आधारित विज्ञान में एक विशिष्ट समानता है, और वह है दोनों का लक्षित धेय सत्य अर्थात सत्य का अन्वेषण
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